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एफ ए सी टी की कहानी

कृषि ही सदा हमारी जनता का मुख्य आधार है और शताब्दियों से हम भूमि जोतने तथा फसल काटकर लाभ पैदा कर रहे हैं, स्वाभाविक रूप से यह देखा गया है जहाँ कि भूमि की उदारता घटती जा रही थी। फसल का उत्पादन भी कम होता रहा था और इसे शताब्दी के पूर्वार्द्ध हमने देखा। हमें अपनी न्यूनतम खाद्य आवश्यकताओं के लिए आयात का सहारा लेना पडा। सत्य यह है कि हम पर उपजाए दीर्घकालीन बारंबार खेती द्वारा भूमि को अपनी उर्वरकता नष्ट हो गई है। कृषि के अधीन भूमि में उर्वरकता की असंतुलित स्थिति को पुन:स्थापित करने के लिए या मिट्टी को पुन: सख्त बनाने के लिए हमने जो जैव खाद लगाए हैं पर्याप्त नहीं था। विकसित राष्ट्रों ने अन्यथा रासायनिक उर्वरकों द्वारा इस समस्या का समाधान खोजा था और भारतमें स्थित विदेशी मालिक बागान जैसे कुछ बडे पैमाने के कृषि उद्यमियों ने भी अपने निजी उपयोग के लिए रासायनिक उर्वरक आयातित किए जाते हैं।

द्वितीय विश्व महायुद्ध जिन्होंने खाद्योत्पन्नों के आयात के व्यापारिक स्रोतों को समाप्त करके हमारी समस्याओं को गुरुतर बनाया और देश के कुछ भागों में प्रबल हुई अकाल दशा ने हमें बैठकर सोच-विचार करने की प्रेरणा दी। रासायनिक उर्वरक ही इसका समाधान था
, लेकिन हमें तकनीकी जानकारी, कच्चेमाल या उर्वरक संयंत्रों के विन्यास संबंधी स्रोतों का ज्ञान नहीं था। उस समय ट्रावनकोर (केरल) के साहसिक एवं दूरदर्शी प्रशासक, डॉ सी पी रामस्वामी अय्यर ने इन बाधाओं को पार करके केरल के उस समय तक अनसूना एक गाँव में, एक रासायनिक उर्वरक फेक्टरी के विन्यास का पथ दिखा दिया। प्राप्य कुछ स्रोत एवं प्रौद्योगिकी एवं कच्चे माल जो इकट्ठा कर सकें। तत्काल उद्देश्य था किसी अधिक खाद्य उत्पन्न के लिए ताज्जूब पुन:पूतिकारक रासायनिक उर्वरक का उपयोग करना। यह जो 1944 में पेरियार नदी के तट पर स्थापित था एफ ए सी टी, उद्योगमंडल के रूप में आज ज्ञात है। यह संपूर्ण देश के उस समय के बडे पैमाने का पहला उर्वरक कंपनी था।